शिव के प्रशंसा में अनेकों अष्टकों की रचना हुई है जो शिवाष्टक, लिंगाष्टक, रूद्राष्टक, बिल्वाष्टक जैसे नामों से प्रसिद्ध हैं। शिवाष्टकों की संख्या भी कम नहीं है। प्रस्तुत शिवाष्टक आदि गुरू शंकराचार्य द्वारा रचित है। आठ पदों में विभक्त यह रचना परंब्रह्म शिव की पुजा एक उत्तम साधन है । Continue reading
आदि एवं अंत से रहित, सर्वेश्वर शिव देवाधिदेव हैं। मानव मात्र ही नहीं वरन देव, दानव, पशु-पक्षी, यहाँ तक की ईश्वर भी संकट के समय में शिव की ही शरण ग्रहण करते हैं। स्वयं पालनकर्ता श्री नारायण विष्णु भगवान ने शिव जी की सहस्रनामों से स्तुति कर उन्हे प्रसन्न किया था तथा अपना सुदर्शन चक्र पुन: प्राप्त किया था।
प्रस्तुत है विष्णु कृत शिव शस्रनामवलि Continue reading
परमपिता ब्रह्मा ने पर्मात्मा एवं परंब्रह्म शिव की उपासना की थी। इस स्तोत्र को ब्रह्मा कृत माना जाता है। Continue reading
पंचाक्षर स्त्रोत शिव के महामंत्र नम: शिवाय के पांच अक्षरों न्, म्, शि, व्, य् को एक सुन्दर स्तोत्र में लयबद्ध कर देता है। इस अदभुत मंत्रक का नित्य ध्यान करने से शिव के पून्य लोक की प्राप्ति होती है तथा परम आनन्द की अनुभुति भी।
(for English translation please refer to Shiva Panchakshar Stottram ) Continue reading
आदिगुरू श्री शंकराचार्य द्वारा रचित यह शिवस्तव वेद वर्णित शिव की स्तुति प्रस्तुत करता है। शिव के रचयिता, पालनकर्ता एव विलयकर्ता विश्वरूप का वर्णन करता यह स्तुति संकलन करने योग्य है। Continue reading
आदि गुरू शंकराचार्य द्वारा रचित शिव मानस पूजा शिव की एक अनुठी स्तुति है। यह स्तुति शिव भक्ति मार्ग के अतयंत सरल पर साथ ही एक अतयन्त गुढ रहस्य को समझाता है। शिव सिर्फ भक्ति द्वारा प्रापत्य हैं, आडम्बर ह्की कोई आवश्यकता नहीं है। Continue reading
शिव की पुजा अनेको स्वरूप में होती है – साकार एवं निराकार। पर उनका लिंगस्वरूप सर्वाधिक प्रसिद्ध है। लिंगाष्टक उन्ही महादेव शिव के लिंग स्वरूप के गुणो का वर्णन करता है। Continue reading
शिव जगतगुरू हैं। परं शिव भक्त कागभुषण्डि ने अपने गुरू का अनादर किया तो उन्हे भी शिव क्रोधित हो गए। गुरू परंपारा का अनादर शिव का ही अनादर था। और एसे में जन्म होता है रूद्राषटक कथा का। Continue reading
परम शिव भक्त कागभुशुण्डि ने जब अपने गुरू की अवहेलना की तो वे शिव के क्रोध-भाजन हुए। अपने शिष्य के लिए क्षमादान की अपेक्षा रखने वाले सहृदय गुरू ने रूद्राष्टक की रचना की तथा महादेव को प्रसन्न किया। सम्पुर्ण कथा रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में वर्णित है। Continue reading
शिव परं ब्रह्म हैं एवं सम्पुर्ण जड एवं चेतन जगत में व्याप्त हैं। शिव ही त्रीदेव हैं। पर अनेक बार भ्रांतिवश, हम न सिर्फ हम उन्हे अलग समझते हैं वरण उनके ही स्वरूपों में किसी एक को अन्य से श्रेष्ठ समझ दुसरे से ईर्ष्या भी करते हैं। उन सर्वव्यापक शिव के विवध स्वरूप एवं उनमे एका का वर्णन Continue reading