रावण परम शिव भक्त था। रावण ने स्वयं द्वारा ही रचित इस शिव ताण्डव स्त्रोत द्वारा महादेव को इतना प्रसन्न कर लिया कि वो त्रिलोक विजय बनने में सफल हो पाया … Continue reading
“आकाशं लिंगमित्याहु: पृथ्वी तस्य पीठिका।
आलय: सर्व देवानां लयनार्लिंगमुच्यते ॥
आकाश (वो विस्तृत महाशून्य जिसमे सम्पुर्ण ब्रह्माण्ड समाहित है) लिंग का स्वरूप है और पृथ्वी उसकी पीठिका (आधार) है। प्रलय काल में समस्त सृष्टि तथा देवगण आदि इसी लिंग मे समाविष्ट हो जाते हैं।”