“आकाशं लिंगमित्याहु: पृथ्वी तस्य पीठिका।
आलय: सर्व देवानां लयनार्लिंगमुच्यते ॥
आकाश (वो विस्तृत महाशून्य जिसमे सम्पुर्ण ब्रह्माण्ड समाहित है) लिंग का स्वरूप है और पृथ्वी उसकी पीठिका (आधार) है। प्रलय काल में समस्त सृष्टि तथा देवगण आदि इसी लिंग मे समाविष्ट हो जाते हैं।”